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शनिवार, जनवरी 9


वजीर- दिल से खेला गया दिमागी खेल
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कमाल की थ्रिलर फ़िल्में भारतीय सिनेमा में कम ही देखने को मिलती हैं| इसके पहले एक फिल्म आई थी- बदलापुर| गजब थ्रिल, ड्रामा, सस्पेंस ! अदभुत !! एक और फिल्म दृश्यम भी बहुत कसी हुई फिल्म थी|

वजीर अपनी कहानी और स्क्रिप्ट में थोड़ा कम है| फिर भी यह फिल्म देखने लायक है|
आतंकवाद जैसे पूरी तरह राजनीतिक मसले को निजी दुश्मनी तक केन्द्रित करके एक आदमी से बदला लेने में अपनी पूरी बुद्धि, तर्क यहाँ तक की जीवन भी झोंक देने की कहानी है -- वजीर |



वजीर में थ्रिल है, ड्रामा है, सस्पेंस है| गजब की कसी हुई फिल्म है| इंटरवल से पहले का हर दृश्य जैसे किसी शार्प खांचे के भीतर रखकर छाँटा गया हो| एक भी दृश्य फालतू नहीं! एक एक दृश्य बस जैसे कहानी को तेजी से आगे बढाने के लिए मरा जा रहा हो| इंटरवल तक फिल्म ज़रा भी विराम नहीं लेने नहीं देती कि आखिर कहानी का मोटिव क्या है | इसके बाद आप को जरा साँस लेने का वक्त मिलता है, आप कहानी पर सोचना शुरू कर सकते हैं| आप वजीर और उसके मास्टर के बारे दिमागी घोड़े दौड़ाने लगते हैं|

कहानी कुछ इस तरह है - फरहान अख्तर यानी दानिश अली एटीएस अफसर है| अचानक हुई आतंकवादी मुठभेड़ में उसकी सात साल की बेटी मारी जाती है| इसके लिए दानिश खुद को कुसूरवार समझता है, और उसकी पत्नी रुहाना (अदिति राव हैदरी) भी उसी को अपनी बेटी की मौत का ज़िम्मेदार मानती है| अपराध बोध और अवसाद में डूबा दानिश अपनी बेटी की मौत का बदला उस आतंकवादी को मार कर लेता है|


इस जाँनिसार मोहरे पर शतरंज के मास्टर ओमकारनाथ धर यानी पण्डित जी की नज़र पड़ गयी है| पंडित जी टूटे दिल के इस बेख़ौफ़ नौजवान से दिली दोस्ती बना लेते हैं| पंडित जी वोडका पीने वाले महापण्डित हैं| एक कार एक्सीडेंट में अपनी पत्नी और अपनी टाँगें खो चुके पंडित जी का दिमाग शतरंज के मोहरों में जिंदगी की चालें बुनता है| एक काश्मीरी मंत्री यज़ाद कुरैशी के घर हुई अपनी बेटी नीना की रहस्यमय मौत का बदला वह मंत्री से लेना चाहते हैं| लेकिन कैसे ? बिना पैर, बूढ़ा शरीर और अकेले , वह अपनी प्यारी बेटी की मौत का बदला एक ताकतवर और शान्ति के मसीहा के रूप में लोकप्रिय मंत्री कुरैशी से कैसे ले?




और एक वजीर है जो पंडित जी की जान के पीछे पड़ा है, क्योंकि वजीर को पता है कि पंडित जी मंत्री से बदला लेना चाहते हैं| कौन है यह वजीर? क्या पंडित जी अपनी बेटी के हत्यारे से बदला लेने में कामयाब हो पाते हैं? और दानिश अली अपने दोस्त पंडित जी को बचा पाता है?


इन सवालों का जवाब तो वजीर देखने पर ही आपको मिलेगा|

फिल्म का पहला हिस्सा बहुत कसा हुआ है| बाद में फिल्म में इमोशनल ड्रामा ज्यादा होने से झोल हो गया है| यह फिल्म कहानी या थ्रिल या सस्पेंस के लिए नहीं बल्कि अमिताभ की अदाकारी के लिए देखी जायेगी|


अमिताभ बच्चन वाकई एक्टिंग के महानायक हैं| बढती उम्र के उनकी हर परफ़ॉर्मेंस मील का पत्थर साबित हो रही है| एक ऐसा रोल जिसके पैर भी नहीं हैं, चेहरे के भावों से ही सब कुछ कह दिया गया है| अमिताभ की बढती उम्र का दिखना इस रोल को और विश्वसनीय और भी उम्दा बना देता है| गजब की एनर्जी, आवाज़, चेहरे की भाव प्रवणता... पहले मैं सोचती थी कि बुढापे में चेहरे पर भाव नहीं आ पाते, पर अमिताभ का चेहरा तो जैसे पानी की तरह हलचलों से भरा हुआ है|

फिल्म देखी जा सकने का दूसरा कारण हैं फरहान अख्तर की अदाकारी| उन्होंने भी अमिताभ बच्चन के सामने टिकने में सफलता हासिल की है|

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत सुन्दर है| हरियाली के बीच झरती बारिशें... शीशे की दीवारों पर फिसलती बूँदें, काश्मीर के बर्फ से ढंके रास्ते ...

नील नितिन मुकेश का वजीर का छोटा सा रोल बहुत बेहतरीन है, ऊर्जा से भरपूर, एकदम फ्रेश ! वहीँ जॉन अब्राहम के करने को कुछ था ही नहीं|

अदिति के भी करने को कुछ नहीं था| फिर भी यह बात बहुत अच्छी लगी कि निर्देशक ने उनको ऑब्जेक्ट की तरह नहीं बल्कि व्यक्तित्व की तरह ही प्रस्तुत किया है| यह बात पूरी फिल्म में नोटिस करा ले गयी कि महिला किरदार को कहीं भी ऑब्जेक्ट नहीं बनाया गया, मंत्री के घर में जहाँ नीना का इस्तेमाल दिखाया जा सकता था, वहां भी फिल्म बहुत लॉजिकल तरीके से केवल मुद्दे पर केन्द्रित रही|

बिजॉय नाम्बियार की यह फिल्म खोखले राष्ट्रवाद का शिकार नहीं बनी | यह बात तारीफ़ के लायक है| शुरू में जिस तरह नौकरी से बरखास्त दानिश आतंकवादी की निर्मम और अवैधानिक तरीके से हत्या करता है और हॉल में मौजूद युवा राष्ट्रवादी ज़ोरदार तालियाँ और हर हर महादेव का नारा लगाते हैं, उससे तो लगा कहीं यह फिल्म "बेबी" तो नहीं साबित होगी|

फिर भी कहानी में झोल तो है ही| दो मंझे हुए अभिनेता अपने बल पर फिल्म संभाल ले गये, पर अगर एक ज़बरदस्त कहानी भी उनका साथ देती तो यह फिल्म बहुत शानदार हो सकती थी|

आतंकवाद जैसे पूरी तरह राजनीतिक मसले को निजी दुश्मनी तक केन्द्रित करके एक आदमी से बदला लेने में अपनी पूरी बुद्धि, तर्क यहाँ तक की जीवन भी झोंक देने की कहानी है -- वजीर |

ख्याल यह भी आता है कि क्या भारत में कोई ऐसा फिल्मकार नहीं है जो आतंकवाद की जड़ और कारणों को खोलते हुए एक काबिल फिल्म बना पाए!! बजाय "दिल से" या "बेबी" टाइप पैसा कमाऊ और राष्ट्रवाद भुनाऊ फिल्मों के |


शनिवार, सितंबर 19

कट्टी बट्टी का फ्लॉप शो


कट्टी बट्टी का फ्लॉप शो
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कट्टी बट्टी का बहुत इंतज़ार था. इधर कंगना रानौत ने फैशन, क्वीन, तनु वेड्स मनु, फिर तनु मनु पार्ट दो से उम्मीदें इतनी बढ़ा दीं कि कंगना के नाम पर किसी भी फिल्म की एडवांस बुकिंग कराई जा सके. इस बार यह रिस्क इमरान खान के बावजूद लिया. जिनके हिस्से में न तो कोई उम्दा फिल्म है न ही अच्छी एक्टिंग. और न ही कोई अच्छा फिल्म चयन. कट्टी बट्टी की नाव पर सवारी करने चल पड़े कि चलो पतवार तो कंगना के हाथ में है.

कंगना के अभिनय ने तो निराश नहीं किया. पर फिल्म की कहानी ही ऐसे ऐसे ट्वीस्ट खाए कि दर्शक को चक्कर आ जाए तो कँगना का अभिनय भी क्या करे.

फिल्म में एक ऎसी लड़की पायल की कहानी है जो बहुत बिंदास सोच की है. कालेज लाइफ में एक लड़का मैंडी उर्फ़ माधव (इमरान खान) उस पर मर मिटता है. पायल उसे प्रेम नहीं करती पर मैंडी के बहुत पीछे पड़ने पर वह प्यार तो नहीं पर टाइम पास के लिए तैयार हो जाती है.

लेकिन बला की खूबसूरत इस डॉल पर मैंडी दिलोजान से फ़िदा है. वह सोचता है पायल भले उसे टाइम पास कह रही है पर वास्तव में वह उसे प्यार करती है. और उसे कभी छोड़ कर नहीं जायेगी.

दोनों लिव इन में रहने लगते हैं. पाँच साल साथ रहने के बाद अचानक एक दिन पायल बिना बताये उसे छोड़ के चली जाती है. मैंडी उसकी खोज में हर संभव जगह भटकता है. एक दिन पायल उसे मिलती है. वह किसी और से शादी करने जा रही है.

इसके आगे कहानी तो बहुत है और खूब पेंच भी हैं, पर कहानी का रस जैसे निकाल दिया है. इसलिए इसके आगे कहानी पता करनी हो तो कट्टी बट्टी पर दो सौ रूपये खर्च कीजिए
तब पता लगेगा कि जो पिक्चर इंटरवल तक देखी वह तो सिर्फ मैंडी यानी इमरान खान के नजरिये थी, फिर दूसरा हिस्सा लगेगा कि यह पायल का पक्ष है... इसके बाद तीसरा हिस्सा है जो सबसे ज्यादा पकाऊ है वह निर्देशक का पक्ष है. जिसमें अजीब ही बात पता लगती है. पुरानी फिल्मों की तरह कि हीरोइन को जानलेवा बीमारी है इसलिए वह हीरो से लड़ने और अलग होने का नाटक कर रही थी. इसके बाद पुरानी फिल्मो की तरह ही हीरो परिस्थितियों से जूझता हुआ हीरोइन को हासिल करता है और कहानी का ढर्रात्मक अंत होता है.

कहानी से कुछ महत्वपूर्ण शिक्षाएं भी मिलती हैं मसलन--
--लड़की कैसी भी आधुनिक मूल्यों की हो और लड़का कितने भी पारंपरिक मूल्यों का हो, अगर लड़की को कायदे से घेर-घार के पीछे पड़ा रहे तो लड़की पट ही जाती है.
--लड़की प्यार में कितना भी न -नुकुर करे, उसको बोदर ही मत करो जी, उसकी हर न -न को हाँ हाँ ही सुनो.

इसका नाम कट्टी बट्टी नहीं , चट्टी पट्टी भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ना था. फिल्म में गाने और संगीत ठीक ठीक ही हैं, बस किसी तरह गुजर जाते हैं. दृश्यों की भरमार है. फिल्म का ट्रैक ही निर्देशक तय नहीं कर पाया है कि कामेडी बनानी है, या ड्रामा, या कॉमिक या ट्रेजेडी. नतीजा यह कि पिक्चर में सब कुछ ठूँस दिया है.


फिल्म की शुरुआत कुछ उम्मीदों भरी थी. मुझे लगा कि जैसे अब तक कुछ लड़के प्यार को टाइम पास की तरह करते रहे हैं शायद फिल्म लड़की के बहाने इस कहानी को उलट कर दिखायेगी. पर फिल्म का अंत फुल पारम्परिक है. निर्देशक निखिल अडवाणी को लगा होगा कि डी डी एल जे एक ही बार बनी पर देवदास बार बार बनी क्योंकि ट्रेजेडिक लव खूब बिकता है. यह उनकी फिल्म में डायलॉग भी है.


बहरहाल, इसके बाद भी अगर फिल्म देखी जा सकती है तो वह कँगना की दिलकश अदाओं के लिए, उनकी अदाकारी के लिए. हालांकि कँगना बेहद दुबली लगी हैं. कई बार तो कुपोषित भी. या हो सकता है कि बीमारी के कारण ऐसा दिखाया हो. इमरान उनके आगे बच्चे ही लगे हैं.



फिल्म में मैडी के पिता का रोल सुनील सिन्हा ने किया है. एक केयरिंग पिता के रूप में वे बहुत मधुर लगे हैं. उनका आना बहुत स्वाभाविक और ताजगी से भरा है.

जो लोग सलमान टाइप फिल्मे नापसन्द करते हैं वे उससे बचने के लिए इसे देख सकते हैं. क्योंकि उससे तो यह फिल्म ठीक ही है. लेकिन कँगना मैडम .... फिल्म चयन में थोडा सावधान रहिये . हम दर्शक आपको बहुत प्यार करते हैं.

सोमवार, अगस्त 24

यह कौन सा राष्ट्र है जहां दसरथ माझी रहता है !

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दसरथ माझी इस लोकतंत्र के मुँह पर तमाचा है !

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मैंने यह फिल्म रिलीज़ वाले दिन ही देखी. फिल्म देखकर सच मन में गुस्से का ज्वार सा उठता है. रात को ठीक से नींद नहीं आई और मैं सोचती रही जो लोग दसरथ को माउन्टेनमैन या पागल प्रेमी बना रहे हैं वे इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्रूर हत्यारे चेहरे को एक रोमांटिसिज्म के नकाब में ढँक रहे हैं.

दसरथ मांझी की कहानी सब जानते हैं. जीतन राम मांझी के कारण आज सब यह भी जानते हैं कि मांझी बिहार की अतिदलित जाति है जिसके बहुतायत लोग आज भी चूहा खाकर जीने को विवश हैं. कि यह अतिदलित जाति बिहार के जैसे मध्ययुगीन सामंती राज्य व्यवस्था में सवर्ण सामंतों के भयानक दमन और उत्पीड़न का शिकार हुए हैं और आज भी हो रहे हैं.

दसरथ माझी का जीवन जैसा भी फिल्म ने दिखाया बेहद उद्वेलित करता है, कई बार दिल जलता है और भीगता है.

हालांकि फिल्म इससे बेहतर दिखा सकती थी. कमजोर स्क्रिप्ट, अत्यधिक नाटकीयता कई बार बहुत इरिटेट करती है. लगता नहीं केतन मेहता की फिल्म है. फिर नवाज़ का अभिनय साध लेता है. टूटता पहाड़ इसे अपने कन्धों पर रोक लेता है.

कई दृश्य तो बिलकुल नुक्कड़ नाटक की झलक हैं.
इसके बावजूद फिल्म ज़रूर देखी जानी चाहिए. तमाम कमियों, कमजोर पटकथा, बनावटी संवादों के बावजूद यह फिल्म एक एहसान है क्योंकि यह फिल्म ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रीय पहचान दिलाती है जिसे दुनिया के सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र ने सिर्फ उपेक्षित ही नहीं किया बल्कि उसे बहुत तकलीफ दी, बहुत पीड़ा दी. बहुत अपमान दिया.

मैं फिल्म देखती हूँ, दसरथ माझी पहाड़ को चुनौती दे रहा है... खून से सने कपड़े, उसकी चुनौती ..फिल्म का पहला सीन -- और डायलाग सुनते ही हॉल में दर्शकों का तेज ठहाका ! क्यों ? यह तो मार्मिक दृश्य है. दसरथ का दुःख क्रोध में रौद्र हो रहा है. पर दर्शक नवाज़ को देसी भाषा बोलते देख हंस रहा है.

ऐसे और भी संवेदन शील दृश्य हैं जो दर्शकों के ठहाके का निशाना बन गये- क्रूर मुखिया के सामने से दलित चप्पल पहन कर जा रहा है. मुखिया ने आदेश दिया इसकी वो हालत कर दो कि आगे से इसके पाँव चलने लायक भी न रहें, चप्पल तो दूर की बात है. दलित माफ़ी माँगता है, पाँव गिरता है पर मुस्टंडे उसे घसीटकर ले जाते हैं और उसके पाँव दाग देते हैं, भयावह चीत्कार गूंजता है पर दर्शक ठहाका लगाते हैं.

जब युवा दसरथ धनबाद की कोयलरी में काम करके कुछ पैसा कमाने के बाद थोडा बना ठना अपने गाँव लौटता है तो मुखिया क लोग उसे बुरी तरह कूट देते हैं, यहाँ भी दर्शकों का ठहाका सुनाई देता है. फाड़े हुए कपड़ों और नुचे हुए शरीर से भी दसरथ भी अपने घर में मौज लेता है. यहाँ पता नहीं कि असली दसरथ भी ऐसा ही कॉमिक चरित्र का था या नहीं. लेकिन ये फिल्म के कमजोर हिस्से बन गये जो वास्तव में बहुत मजबूत हो सकते थे.

यहाँ माओवादियों के आने और जनअदालत लगा कर मुखिया को फाँसी देने का दृश्य बहुत कमजोर बन गया, जो फिल्म का एक शानदार टर्निंग प्वाइंट हो सकता था. लेकिन शायद निर्देशक दिखाना ही यही चाहते थे जो उन्होंने दिखया.

दसरथ के पत्नी फगुनिया के साथ रोमांटिक दृश्य तो बाहुबली की याद दिलाते हैं. जब झरने की विशाल पृष्ठभूमि में फगुनिया एक जलपरी की तरह अवतरित होती है. क्या प्यार हर जगह ऐसे ही होता होगा. बाहुबली टाइप का. हर फिल्म में नायक-नायिका की कमोबेश एक जैसी छवि. आदिवासी, अति दलित समाज में भी सौन्दर्य के वही रूपक, वही बिम्ब.


अकाल का सीन। लग रहा है यह कोई जंगल की बात है। कोई सरकार नहीं है। कोई देश नहीं है। कोई राहत कोष महीन है। यह कौन सा राष्ट्र है जहां दशरथ माझी रहता है ! यह कौन सी सदी की बात है! तब आदमी चाँद पर तो न ही पहुंचा होगा जब दसरथ माझी आकाश की आग तले पहाड़ तोड़ रहा था। तब शायद पत्थर तोड़ने वाली मशीन भी भारत न आई होगी जब दसरथ पहाड़ तोड़ रहा था.

एक कुआं खोदना बहुत मुश्किल काम होता है, पथरीले इलाके में यह कुआं खोदना बेहद मुश्किल होता है, और पथरीले पहाड़ को तोड़ कर सड़क बनाना.... यह अविश्वसनीय काम है.

जब दसरथ पहाड़ तोड़ रहा था, जब अपनी ज़िन्दगी के बाईस साल उसने सड़क बनाने में लगा दिए, उस समय डायनामाईट से पहाड़ तोड़कर सड़कें बन सकती थीं और यह काम महज कुछ माह का था. पर दसरथ डायनामाईट के ज़माने में छेनी और हथौड़ी से सड़क बना रहा था. और हमारी व्यवस्था गौरवान्वित महसूस कर रही थी.

दसरथ की ज़िन्दगी से यह भी समझ में आता है कि पहाड़ से लड़ना आसान है पर पहाड़ जैसी व्यवस्था से लड़ना बहुत कठिन।

22 साल दशरथ ने पहाड़ तोडा, सबने देखा होगा। लोकतन्त्र के चरों खम्भो को पता था पर कोई खम्भा ज़रा भी डगमगाया नहीं आखिर खम्भा जो था।

तब जनप्रतिनिधि उस क्षेत्र के विधायक सांसद पंचायत क्या करते रहे।

दशरथ माझी कौन है इस देश के महानायक तो अमिताभ बच्चन हैं।

दशरथ माझी को अपने जीवन भर ज़िन्दगी जीने तक का सहारा नहीं मिलता पर उसके नाम पर बनी फ़िल्म करोड़ों कमाती है।

हम फ़िल्म में एडवेंचर पसन्द करते हैं। बेसिकली हम दशरथ को पसंद नहीं करते हम दशरथ द्वारा दिए माउंटेन मैन के मनोरंजन को पसन्द करते हैं। दसरथ जब तक था शायद ही हममे से किसी ने उसके जीवन के बारे में सोचा हो। और शायद ही किसी को यह जानने में दिलचस्पी हो कि दशरथ का परिवार इस समय भी बदहाली में जीने को मजबूर है.

यह कौन सा राष्ट्र है जहां दशरथ माझी रहता है !

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे और तिग्मांशु धूलिया के बेहतरीन अभिनय के बारे में काफी कुछ कहा जा चुका है. फिल्म के पसंद किये जाने का कारण नवाज का लुक और अभिनय ही है.

शुक्रवार, अगस्त 7

ये हर दिन चौबीस घंटा खबरिया चैनलों ने पका दिया है.

ये हर दिन चौबीस घंटा खबरिया चैनलों ने पका दिया है.



हर रोज वही बात--- याकूब मेमन, टाइगर मेमन , फिर उनकी माताजी, फिर उनका फोन.... फिर आसाराम, राधे, सुषमा, स्मृति... वही अपना अपना राग !!


चैनल वाले ख़ुफ़िया, पुलिस, सेना, विदेश मंत्रालय सबका काम खुद ही कर लेने पर उतारू हैं. और हाँ , अदालत तो खैर रोज ही चलाते रहते हैं . हद है !!


आतंकवाद की खबरों को इतना मिर्च मसाला लगाकर चौबीस घंटा उसे तानने की क्या ज़रुरत है. उसे देखने के लिए गृहमन्त्री हैं, खुफिया एजेंसी हैं, उन्हें जो उचित लगे वे फैसला लें. आखिर देश में एक चुनी हुई सरकार है. उस पर आम जनता के साथ मीडिया को भी भरोसा दिखाना चाहिए. हर रोज का यह टीआरपी खोर मीडिया ट्रायल बंद होना चाहिए. मीडिया का काम खबर देना है वे ख़बरें दें. 


कहीं आतंकवादी हमला हुआ तो लाइव प्रसारण, युद्ध हुआ तो लाइव , बंधक बना लिया तो लाइव, मुख्यमंत्री विधान सभा जा रहा है तो लाइव... इधर घटना हुई नहीं , एक पल नहीं बीत पाता , उस पर स्टूडियो महारथियों का नानसेंस विश्लेषण शुरू ! 


इतने फौरी और कच्चे विश्लेषण परोसे जाते हैं कि मीडिया खबर मजाक बन के रह गयी है. यही वजह है कि खबरिया चैनलों की भरमार के बाद भी अखबार न सिर्फ टिके हैं बल्कि प्रसार संख्या भी रुकी नहीं है.



यह समझना चाहिए कि राधे माँ, आसाराम बापू के अलावा इस देश में असली माँ-बाप भी रहते हैं. उनकी भी कुछ बुनियादी समस्याएं हैं. उनके बच्चों के स्कूल दाखिले की समस्या है, अच्छी और सस्ती पढ़ाई, समय से रोजगार, खेल के मैदान, बच्चो को सस्ती चिकित्सा जैसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर बात होनी चाहिए. 



रोज सिर्फ राजनेताओं की आपसी झिक झिक देखने को मिलती है, चैनल स्टूडियो में सब आकर दुश्मनों की तरह भिड जाते हैं. अरे भाई , राजनेताओं के अलावा भी एक दुनिया है, जो देश की समस्याओं पर पढ़ती लिखती और चिंतन करती है, कभी पैनालिस्ट में उन्हें भी बुलाइए.


याकूब मेमन, टाइगर, दाउद, नावेद, आसाराम, राधे ने जो भी किया है इसके लिए क़ानून है . अदालतें हैं, जो इन्हें सजा देना तय करेंगी. हर बात का मीडिया ट्रायल क्यों? और कितने महीने चलेगा? इन सब के चक्कर में असली मुद्दों पर कभी बात ही नहीं होती. फाँसी का मामला इतना लाइव दिखाया गया मानो मीडिया को सब तय करना हो. सत्ता और सरकार भी मीडिया के इसी चरित्र से पूरे समाज में तोड़-फोड़ पैदा करके ध्रुवीकरण करते हैं.


यह भी समझ में आता. अगर आप देश के बाकी कैदियों की कहानी भी कवर करते. देश की जेलों में न जाने कितने विचाराधीन कैदी हैं, कितने ही आरोपी बिना अपराधी सिद्ध हुए ही सिर्फ इसलिए जेल काट रहे हैं कि उनके पास जमानत के लिए पैसा नहीं है, वे गरीब हैं और अच्छा वकील नहीं कर सकते, और कोर्ट में केस की भरमार है उनका नंबर इस जीवन में आयेगा भी कि नहीं, नहीं कहा जा सकता. 


ऐसे तमाम लोगों के मुद्दे को मीडिया नहीं उठाता. वे कोई सेंसेटिव केस उठाते हैं, या अपराधियों में भी स्टार बनाते हैं. मसलन दाउद की हर खबर स्टार वैल्यू की तरह मीडिया दिखाता है. मीडिया की गैर ज़िम्मेदारी की हद यह है कि उन्हें यह नहीं पता कि घर में बहुत छोटे बच्चे भी टीवी देखते हैं. हर पल अपराध खबर देखते वे क्या बनेंगे??



और यह हो भी रहा है. बच्चे अपने कुल टीवी टाइम में अपराधियों, गलत राजनीति और बडबोले नेताओं को जितना सुनते हैं, अच्छी खबर क्या उतनी दी जाती है?? बच्चो के भीतर भी, और युवाओं में भी नैतिक अनैतिक का भेद ख़त्म हो रहा है. जितनी देर दाउद के बारे में बात मीडिया करता है किसी वैज्ञानिक के बारे में, किसी शिक्षक के बारे में, किसानो से सम्बंधित किसी नए सिंचाई यंत्र के बारे में मीडिया कभी बात ही करना नहीं दीखता. ये ख़बरें ही गायब हैं. 


इन सबके बीच मीडिया से जनता गायब है, जन आंदोलनों की ख़बरें गायब हैं, किसान गायब है , किसान के मुद्दे गायब हैं, बदलाव की लड़ाई लड़ रहे तमाम जन नेता गायब हैं, रोजगार की जंग लड़ते युवाओं का संघर्ष गायब है. 


भाई लोगों, सुषमा-सोनिया से आगे बढिए !! हम पैसा देकर रोज आपकी यह बकवास झेलते हैं. इतना पैसा वसूलते हो कम से कम खबर तो दो. घर के भीतर परमानेंट अखाड़ा तो मत खोदो. 


इतना नकार भरा है मीडिया में .... इससे बाहर निकलना होगा. बेशक कारपोरेट चैनलों का हित सत्ता के साथ सधता है और हर चैनल सत्ता का भोंपू बन जाता है. पर जनता को अपनी बात तो कहनी ही होगी. 


शुक्र है , सोशल मीडिया है, जहां अभी बहुत गुंजाइश है. हालाँकि कारपोरेट मीडिया यहाँ भी ट्रेड सेटर का दबाव बनाता है फिर भी सोशल मीडिया में कुछ ताज़ी हवाएं लगातार बहती हैं.

एकदम हाई वोल्टेज फिल्म है दृश्यम

एकदम हाई वोल्टेज फिल्म है दृश्यम



इतनी दमदार कहानी, उत्सुकता, अभिनय, रोचकता कि पूरी फिल्म भर आप यह भूल जायेंगे कि आप किस शहर में हैं और कहाँ बैठे हैं ! बस परदे पर फिल्म चल रही है और आप खुद जैसे एक पात्र बनकर उसमे शामिल हैं. फिल्म का हर मूव, हर अटैक जैसे आप पर ही हो रहा है और साँसें जैसे अटक सी जाती हैं, दिल खुद ही थम जाता है.


क्या सही है ..क्या गलत, नैतिक- अनैतिक , कानूनी गैर कानूनी के तमाम पचड़े सोचने का फिल्म मौका ही नहीं देती. जब तक आप हॉल में होते हैं बस कहानी ही राज करती है.
फिल्म दर्शक की नब्ज़ ही नहीं पकड़ती, नसें तक तनाव में ला देती है.


दृश्यम.... यह अनोखा सा नाम है फिल्म का. ऐसे नाम साधारणतः हिंदी फिल्मो के नहीं होते. दक्षिण की फिल्मो में ऐसे संस्कृतनिष्ठ नाम ज़रूर मिलते हैं. यह मुझे बाद में पता लगा कि यह फिल्म मलयालम में बनी थी, जिसे 2013 में रिलीज़ किया गया. यह मलयालम की सुपर डुपर हिट फिल्म रही और 50 करोड़ कमाने वाली मलयालम की पहली फिल्म बनी जो 150 से भी ज्यादा दिन तक मलयाली सिनेमाघरों में दौड़ती रही.

दृश्यम - हिंदी में रीमेक हुई. कहानी और निर्देशन इतना दमदार है कि आप समझ सकते हैं कि बाहुबली और बजरंगी भाईजान की आँधी में भी दृश्यम को हिंदी फिल्म दर्शकों का ज़बरदस्त रुझान हासिल हुआ.

कहानी संक्षेप में यह है कि अजय देवगन एक सामान्य मध्यवर्गीय विजय सालगांवकर है, जो केबल का बिजनेस करता है. वह सिर्फ चौथी पास है और फिल्मों का इतना शौकीन है कि कोई फिल्म नहीं छोड़ता. उसके लिए पत्नी (श्रिया सरन) और दो बेटियों का अपना परिवार ही उसकी पूरी दुनिया है जिसे किसी भी मुसीबत से बचाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है.


एक दिन आईजी मीरा देशमुख (तबू) का युवा बेटा सैम , जो थोड़ा बिगडैल है, उसके घर आ पहुँचता है. वह विजय की बेटी को ब्लैकमेल करता है और घर पर मौजूद बेटी और माँ के हाथों अनचाहे वह मारा जाता है. विजय अपनी अनुपस्थिति में हुई इस घटना को छिपाने और अपने परिवार पर कोई आंच न आने देने का निर्णय लेता है.


इस कवायद में पूरा परिवार हर पल मर मर के कैसे जीता है, किस मानसिक यंत्रणा से गुजरता है, और विजय कैसे पुलिसिया रौब दाब और दबंगई का सामना पूरे परिवार के साथ मिलकर करता है, और आखिरकार दृश्यम का एक भला अंत होता है.


मजे की बात यह कि एक्शन के लिए मशहूर अजय देवगन ने इस फिल्म में कोई एक्शन नहीं किया है, न कोई इंटिमेट सीन, न कोई आजकल वाली अश्लीलता, न आइटम सॉंग--- फिल्म पूरी तरह ड्रामा थ्रिलर है. मुझे याद नहीं इतनी कसी हुई फिल्म पहले कब देखी थी.
अजय देवगन और तबू का अभिनय ज़बरदस्त है. साथ में रजित कपूर हमेशा की तरह स्वाभाविक.


जब कोई फिल्म हिट होती है तो पूरी टीम का ही ज़बरदस्त योगदान होता है. उन सब की तारीफ़ एक नाम में करने की कोशिश की जाए तो वह नाम है फिल्म के निर्देशक - निशिकांत कामत का.


तो....
अगर अब तक फिल्म टिकी हो, क्योंकि रिलीज़ हुए काफी समय हो गया, तो आप भी देख ही लीजिये. दृश्यम !!