रविवार, दिसंबर 13

फिर भी इन्द्रधनुष देखेंगे


आती रुत के मन पर घाव जाती रुत के ज़ख्म हरे हैं 
कुछ खोया है कुछ पाया है नश्तर ये काफ़ी गहरे हैं 
फिर भी इन्द्रधनुष देखेंगे फिर भी हम पकड़ेंगे चाँद
आंसू वाली आँखों में उम्मीदों के भी रंग भरे हैं

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत अच्छा कहा --- आंसू वाली आँखों में उम्मीदों के भी रंग भरे हैं

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  2. इतना साहस और किसी के पास है भी नहीं नवोदिता ,इश्वर करे तुम इन्द्रधनुष पकड़ो ,रंगों की चादर ओढो ,जख्म जल्द ही भर जायेंगे

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  3. बेनामीदिसंबर 15, 2009

    kavita kisi ki bapauti nahi hai aavesh ji. ye samvedanaaon ka kriya vyaapaar hai.kavita ke shabd jab hriday se nikalakar kaagaz par utarate hain tab kavita tamaam nayii aakritiyon ko dhaaran kar leti hai. aavesh jii aap kavi nahi balki usaki kavita par dhyan den aur kavita ke marm ko samajhakar uspar comment de. ek salaah hai ki yadi aap kavita ko kavi ka rudan ya jivan samajhate hai to ye aap kii bhuul hai . aap isase pahale ki kisi bhram ko paale behatar hai kavita kii muul pravrittiyon ka adhyayankaren. aur kavita kii maanaviiy saamaajik saanskritk prakriya ko samajhen.

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  4. मन को छू लेने वाली भावनाओं को व्यक्त किया है -- मालविका राव

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  5. हम आपकी कविताओं का नियमित इंतज़ार कर रहे हैं
    लिखिये और पढवाइये

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  6. It's a very well written poem.Needless to state,they bring in light the state of affairs within one's heart and mind.The lines have the satying ability and above all have the power to reinforce one's faith in life's balancing act !!

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